माजुली, 8 मई: ब्रह्मपुत्र के बीच बसे शांत और खूबसूरत माजुली में दो भाइयों ने मेहनत और हौसले की ऐसी मिसाल पेश की है, जो आज पूरे इलाके के लिए प्रेरणा बन गई है। दुलाल सैकिया और तिलक सैकिया ने मिलकर माजुली का पहला पंजीकृत चाय बागान स्थापित कर यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो असंभव दिखने वाले सपने भी सच हो सकते हैं।
‘चेनिमाई टी गार्डन’ नाम से शुरू हुआ यह प्रयास आज सिर्फ एक चाय बागान नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और नई सोच का प्रतीक बन चुका है। कभी लोगों का मानना था कि ब्रह्मपुत्र की रेतीली मिट्टी में चाय की खेती संभव नहीं है, लेकिन इन दोनों भाइयों ने अपनी लगन और प्रयोगों से इस सोच को बदल दिया।
माजुली की प्राकृतिक सुंदरता के बीच बसे इस बागान की शुरुआत करने से पहले भाइयों ने जोरहाट स्थित असम कृषि विश्वविद्यालय से मिट्टी की जांच करवाई। जांच में पता चला कि यहां की मिट्टी में पर्याप्त चिकनाई है, जो चाय की खेती के लिए उपयुक्त है।
दुलाल सैकिया बताते हैं, “हमने 2020 में बीज और पौधे लगाकर इस काम की शुरुआत की थी। काफी मेहनत और देखभाल के बाद 2021 में विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर इस चाय बागान की औपचारिक स्थापना की गई। फिर 2025 में टी बोर्ड ऑफ इंडिया से इसे माजुली के पहले चाय बागान के रूप में पंजीकरण मिला। शुरुआत में लोगों को भरोसा नहीं था कि यहां चाय उग सकती है, लेकिन हमने कोशिश जारी रखी और आज परिणाम सबके सामने है।”
उन्होंने कहा कि उनका सपना सिर्फ चाय उगाना नहीं, बल्कि माजुली के युवाओं को अपने गांव और अपनी जमीन पर ही रोजगार के अवसर तलाशने के लिए प्रेरित करना है, ताकि उन्हें काम की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर न जाना पड़े।
हालांकि यह सफर आसान नहीं था। शुरुआत में चाय फैक्ट्री की कमी, प्रशिक्षित मजदूरों का अभाव और तकनीकी जानकारी न मिलने जैसी कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। लेकिन दोनों भाइयों ने हार नहीं मानी और धीरे-धीरे करीब एक बीघा जमीन को हरे-भरे चाय बागान में बदल दिया।
आज ‘चेनिमाई टी गार्डन’ में हर सप्ताह चाय की पत्तियां तोड़ी जा रही हैं और उन्हें प्रोसेसिंग के लिए धेमाजी के हाबुंग स्थित फैक्ट्री भेजा जाता है। दुलाल सैकिया के अनुसार, “अभी हम करीब एक बीघा जमीन पर खेती कर रहे हैं। जब पौधे पूरी तरह तैयार हो जाएंगे, तो एक बीघा से 80 से 90 किलो तक पत्तियां मिल सकती हैं। हम महीने में चार बार पत्तियां तोड़ते हैं और अब तक सबसे अधिक 66 किलो पत्तियां एक बार में प्राप्त हुई हैं।”
उन्होंने बताया कि पहले उनकी चाय की पत्तियां मस्कोवा की फैक्ट्री भेजी जाती थीं, लेकिन इस साल से हाबुंग फैक्ट्री में भेजी जा रही हैं। अब दोनों भाई अपने इस छोटे से सपने को और बड़ा बनाने की तैयारी में हैं। वे तीन बीघा से अधिक जमीन पर चाय बागान फैलाने की योजना बना चुके हैं और इसके लिए जरूरी तैयारियां भी शुरू कर दी हैं।
माजुली की मिट्टी में उगी यह चाय आज सिर्फ फसल नहीं, बल्कि उम्मीद, संघर्ष और आत्मविश्वास की खुशबू बन चुकी है।





